Wednesday, September 15, 2010

अयोध्या, 1992

कहते हैं जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि
कुँवर नारायण की यह कविता इसी का चरितार्थ करती है
अयोध्या मुद्दे पर उनके इस विचार को पढ़ें तथा मस्तिष्क को खुले विचारों से जोड़ें

हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस-बीस नहीं
अब लाखों सिर-लाखों हाथ हैं
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है।
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमटकर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है
‘मानस’ तुम्हारा ’चरित्र’ नहीं
चुनाव का डंका है!
हे राम, कहाँ यह समय
कहाँ तुम्हारा त्रेता युग
कहाँ तुम मर्यादा पुरूषोत्तम
और कहाँ यह नेता युग!
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुराण-किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक...
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!
-कुवँर नारायण

5 comments:

  1. बहुत अच्छा चुनाव...............

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  2. hahaaaaaaaaaaaaaa

    pure makhanlal me ek ek chhate hue naami giraami daksha.......or kya kya sangya du....KAVI KAHANIKAAR BLOGKAAR SAMPRESHANKARTA .....sab bhare hai.......are bhaiya hindi kaha se sikh li yaar ......bhai sabko kuchh na kuchh kahna hai...........chalo ye v thik....... hw many bloggs i hv cmntd even i dnt remember.........hp u cntinue...........JAI AYODHYA NAGARI KI........

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  3. bahut bedia hai
    aaj netoon ko ise ek bar jaroor pedna chaiye

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  4. हे राम .... हे राम ... हे राम ...

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