Wednesday, November 14, 2012





जो सर्द हवाओं में फैली खुश्बू है,

जो बारिश की रिमझिम बूंदों का एहसास है,

जो टिम-टिम करते सितारों की तरह अलग है,

जो गहरे सागर में फैली शान्ति है,

जो पत्तों पर फैली ओस है,

जो गुलाबों की तरह खूबसूरत है,

जो बंद कली की मुस्कान है,

वह सब तुम्हारी पहचान है।

क्या तारिफ करूँ तुम्हारी,

सोचते ही दिल थम जाता है,

आस पास कुछ नहीं दिखता सिर्फ एक अश्क नजर आता है,

जहाँ की सुन्दरता एक पल में दिख जाती है,

महकती हवाओं की खुश्बू फिजाओं में फैल जाती है,

आँखों की गहराईयों में दिल डूब जाता है,

एक तुम्हारा ही एहसास मुझे इस दुनिया से अलग कर जाता है।

Friday, April 6, 2012

कब खत्म होगी इंसाफ की यह जंग?

16 मई 2011, दैनिक जागरण, संपादकीय पृष्ठ, भोपाल संस्करण
इस लेख के बाद मुझे बहुत बधाईयाँ मिलीं, लेकिन मैं खुश नहीं था क्योंकि मेरे जेहन मैं निर्मल जैन के आंसू बार बार आ रहे थे। अब निर्मल जैन जी के साथ मुझे भी इन्तजार है उनके न्याय पाने का।

भारतीयों ने जब अंग्रेजों से भारत छोड़ने को कहा तो उसके पीछे कई कारण थे, जिसमें एक प्रमुख बात थी, भारतीयों को न्याय न मिल पाना। अंग्रेजी सरकार व न्यायपालिका भारतीय जनता के साथ न्यायसंगत व्यवहार नहीं कर रहीं थीं। इन्ही मूलभूत मुद्दों को लेकर हमने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की।
आज देश को आजाद हुए लगभग 63 साल हो गये हैं, लेकिन मध्यप्रदेश के दमोह जिले के निर्मल जैन के प्रकरण को देखकर लगता है कि हम आज भी अंग्रेजी शासन व्यवस्था से उबर नही पाए हैं। ऐसा नहीं है कि सरकारें या न्यायपालिका पूरी तरह भ्रष्ट हैं, लेकिन इसी लोकत्रांतिक व्यवस्था में निर्मल जैन जैसे लोग भी हैं जिनको पूर्ण न्याय नहीं मिल पा रहा है। 1975 में आपातकाल के विरोध में एक साल से ज्यादा मीसा के तहत दमोह जिले के जेल में रहने के बाद से जैन की जिन्दगी तबाह हो गयी। जेल जाने से पूर्व वह दमोह जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक की बिजौरी ग्राम सेवा सहकारी समिति में प्रबंधक थे।जैन के अनुसार आपातकाल का विरोध करने के कारण तत्कालीन बैंक अध्यक्ष ने उन पर 4816.40 रू. के झूठे गबन का आरोप लगाकर 1978 में नौकरी से निकाल दिया। उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 409 के तहत एफआईआर भी दर्ज करा दी। 1978 से 1993 के बीच 16 सालों तक निचली अदालत में चले मुकदमें में अभियोजन पक्ष उनके गबन संबंधी सबूत पेश न कर सका। परिणामस्वरूप निचली अदालत ने जहाँ एक ओर निर्मल जैन को इस प्रकरण से बरी किया, वहीं दूसरी तरफ उनके खिलाफ बनाए गए झूठे गबन के आरोप के लिए बैंक प्रबंधक के विरूध्द आइपीसी की दफा 406 के तहत मुकदमा भी दर्ज किया। बैंक प्रबंधक ने इस फैसले के खिलाफ पहले सत्र न्यायालय और फिर हाईकोर्ट में अपील की। लेकिन दोनों जगहों पर उनकी अपील खारिज हुई।
सोलह सालों तक चले इस मुकदमें के फैसले के बाद निर्मल जैन ने राहत की सांस ली। लेकिन उन्हे क्या पता था कि इंसाफ की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। भारतीय सरकारी तंत्र की कार्यशैली का एक दूसरा भयावह रूप अभी दिखना बाकी था। 25 जनवरी 1993 को न्यायालय से दोषमुक्त सिध्द होने के बाद कानूनी रूप से निर्मल जैन को तुरन्त प्रभावी रूप से नौकरी में बहाल किया जाना चाहिए था। इसके साथ ही पिछले 16 सालों के दौरान उनके समकक्षों को मिले क्रमोन्नोति, भत्ते आदि की समस्त राशि के साथ पूरा वेतन मिलना चाहिए था। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। न्यायालय से दोषमुक्त सिध्द होने के बाद भी उन्हे अपना पूर्व पद प्राप्त नहीं हुआ। पिछले 16 सालों से मुकदमा लड़ रहे जैन की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि वे न्यायालय कादरवाजा नहीं खटखटा सके। उन्होने तत्कालीन राज्यपाल भाई महावीर से मुलाकात की तथा अपनी स्थिति से अवगत कराया। राज्यपाल ने उनकी बात को गम्भीरता से लेते हुए उन्हें मुख्यमंत्री के पास भेज दिया। इस तरह न्यायालय से दोष मुक्त सिध्द होने के बाद भी जैन लगातार उच्च शासकीय पदों पर आसीन लोगों के भटकते रहे। जैन ने राष्ट्रीय तथा राज्य मानवाधिकार आयोग के सामने भी न्याय की गुहार लगाई। उनकी व्यथा सुनकर देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व्यंकट चलैया ने मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत पत्र लिखकर जल्द से जल्द न्याय दिलाने की बात कही थी। इन सब दबावों के बाद भी उन्हे कोर्ट से दोषमुक्त सिध्द होने के 9 साल बाद और सेवा से बर्खास्त होने के 25 साल बाद सन् 2002 में पूर्व पद समिति प्रबंधक का वापस मिला।
जिन्दगी के पचीस साल का संघर्ष बिना किसी अपराध के झेलने वाले निर्मल जैन ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि न्याय की लड़ाई अभी बाकी है। मानवाधिकारों की तिलांजलि देते हुए बैंक प्रबंधक ने उन्हे तीन हजार रू का मासिक वेतन देने का निर्णय किया। 25 साल की लड़ाई लड़ने के बाद यह घटना किसी सदमे से कम नहीं थी, और वह भी तब जब उनके समकक्ष अधिकारी 12 हजार या इससे ज्यादा पा रहे थे। इसके साथ ही उन्हे सेवानिवृत्ति की आयु से दो साल पहले ही हटा दिया गया। पूरे सेवाकाल के दौरान बन रहे भत्ते, ग्रेच्यूटी आदि की समस्त धनराशि जो करीब 17 लाख के आस पास थी उसके जगह सहकारी बैंक ने उन्हे दिये मात्र 1.46 लाख रू।
नर्क सी बन गई जिन्दगी का यह मात्र एक पहलु है। इसके अलावा आपातकाल के दौरान एक वर्ष से ज्यादा समय दमोह जिले के जेल में काटने के बाद, आज तक उन्हे लोकनायक जयप्रकाश सम्मान से वंचित रखा गया है। जिसके तहत 6 हजार रू महीना आजीवन सम्मान निधि दी जाती है। निर्मल जैन के पक्ष में दमोह के कलेक्टर तथा लोकतंत्र रक्षक मीसाबंदी संघ भी सिफारिश कर चुके हैं लेकिन वे अभी भी इस सम्मान तथा धनराशि से वंचित होकर अनाज बेचने का फुटकर काम कर रहे हैं। अपने जीवन की परवाह किये बिना जिस व्यक्ति ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक वर्ष से ज्यादा का समय जेल में बिताया, वह आज दर-दर की ठोकरे खाने के लिए मजबूर है।
34 सालों से लड़ी जा रही यह दु:खद दास्ताँ यहाँ भी खत्म नहीं होती है। नौकरी चले जाने और मुकदमे के खर्चे के कारण घर की माली हालत बहुत खराब हो गई थी। जिसके कारण परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो गया था। आर्थिक तंगी के कारण मकान भी बेचना पड़ गया। पूरा परिवार ने धर्मशाला में जाकर शरण ली। इस दौरान बीत रही मानसिक प्रताड़ना के कारण जैन के इकलौते पुत्र और एक पुत्री ने आत्महत्या कर ली।जैन की माँ क्षय रोग से पीड़ित होने के बाद इलाज की कमी के कारण भोपाल के गांधी नगर आश्रम में तड़प- तड़प कर मर गई। पत्नी पिछले 25 सालों से भयंकर पेट दर्द से पीड़ित है, तथा इस दु:ख और प्रताड़ना के कारण अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है।
आखिर क्या कारण हैं कि स्वतंत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाले निर्मल जैन को लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल का विरोध करने के कारण इतना कष्ट झेलना पड़ा? आपातकाल से शुरू हुई उनकी लड़ाई दो बच्चे वा माँ को खोने के बाद आज भी जारी है। 34 सालों से न्याय की आसमें निर्मल ने जो मानसिक, शारीरिक, आर्थिक प्रताड़ना झेली आखिर उसकी भरपाई कौन करेगा? इस प्रकरण के विषय में जब निर्मल जैन से बात की तो उन्होंनेस्थानीय विधायक से लेकर राज्य सरकार तक फैले भ्रष्टाचार को अपनी बर्बादी का सबसे बड़ाकारण बताया। विकास की नई से नई मिसालें पेश करने वाली सरकारें आखिर निर्मल जैन जैसे प्रकरण सामने आने के बाद आँखे क्यों मूंद लेती हैं? उभरते, चमकते भारत की तस्वीर पेश करने वाली ये सरकारें आखिर एक आदमी की सुध क्यों नहीं ले रहीं हैं? अपना सबकुछ गवां चुके जैन की आँखों में अभी भी आशा है न्याय पाने की। लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि न्याय की कसौटी क्या होगी? निर्मल जैन और उनके परिवार पर इन 34 सालों के दौरान हुई मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक क्षति की भरपाई की बात तो फिलहाल छोड़ ही दीजिए क्योंकि निर्मल जैन की तंत्र से लड़ाई की कहानी तो अभी भी जारी है।

Wednesday, January 25, 2012

जय हिंद जय भारत...




कल रात से ही मुझे गणतंत्र दिवस की बधाइयाँ मिल रहीं। कुछ के जवाब दे पाया कुछ के नहीं, शायद में कुछ परेशान था इसलिए सबको जवाब नहीं दे पाया। रात भर ठीक से नींद नहीं आ पाई, सुबह उठा फेसबुक एकाउंट चेक किया तो पाया गणतंत्र दिवस पर ढेर सारे संदेश पोस्ट किए गये थे, फिर सभी को जवाब दिया। लेकिन मेरी समस्या अभी खत्म नहीं हुई मैं अभी भी परेशान हूँ, कुछ संदेशों में मैंने गणतंत्र दिवस की खुशियाँ पाईं तो कुछ में बुद्धजीवियों ने अपने-अपने तरीके से भारतीय परिदृश्य की कमियों पर भड़ास भी निकाली। आप सभी को मेरी तरफ से सलाम क्योंकि आपने देश के बारें में सोचने का समय तो निकाला। लेकिन मैं अभी भी परेशान हूँ। आखिर मैं परेशान क्यों हूँ, मैं जब इतिहास की किताब पढ़ने बैठता हूँ, तो हर जगह पाता हूँ, अंग्रेजों ने देश को दो हिस्सों में बाँट दिया। गलत है यह दोस्तों अंग्रेजों ने देश के दो हिस्से नहीं किए बल्कि हमने अपने देश को दो हिस्सों में बाँट दिया था। अगर हम एक साथ रहना चाहते तो किसी में भी इतना दम नहीं था जो हमारे प्यारे देश हमारी माँ को बाँट सकता। लेकिन यह भी मेरी समस्या का मुख्य कारण नहीं है। मुझे दुख है तो इस बात पर है कि हमारा देश आज भी बँटा हुआ। जाति,धर्म,वर्ण, लिंग, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक आदि न जाने कितने शब्द हैं जो हमें आज भी बाँटे हुए हैं। और हम बेवकूफों की तरह संकीर्ण सोच पाले हुए हैं कि हम खास हैं हम अलग हैं। हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि हम कुछ भी हों उससे पहले हम इंसान है, हम भारतीय हैं। हमें यह प्रतिज्ञा करनी होगी कि हम सभी अपने- अपने स्तर पर अपने देश, अपने समाज को बेहतर से बेहतर बनाने का प्रयास करेंगें। हम हर एक भारतीय के चेहरे पर खुशियाँ लाएंगें, हर एक को भोजन, शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, रोजगार मिले इसके लिए अपना योगदान देंगें। हम ऐसी किसी विचारधारा का समर्थन नहीं करेंगें जो हमें एक दूसरे से अलग करती हो। दोस्तों हमें यह आजादी बड़ी मुश्किल से मिली है और इसे दिलाने में एक पार्टी या व्यक्ति का योगदान नहीं था, बल्कि यह पूरे राष्ट्र की हुंकार थी जिसकी वजह से अंग्रेजों को भागना पड़ा। भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, सरोजनी नायडु.........दोस्तों हमें ऐसे हजारों नाम मिल जायेंगें जिन्होने हमें आजाद राष्ट्र देने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। हमें अपनी आजादी का महत्व समझना चाहिए तथा अपने प्यारे देश भारत को एक खुशहाल राष्ट्र बनाने के लिए अपनी संकीर्ण मानसिकता को छोड़ सभी को एक दूसरे को अपनाना होगा तथा यह सोचना होगा कि देश को बेहतर बनाने के लिए हम क्या कर सकते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप कौन सा काम चुनते हैं जय हिंद जय भारत....

Friday, October 21, 2011

मेरे अनमोल पल....................... के कुछ अंश

भोपाल छोड़ते वक्त वैसा ही एहसास हुआ, जैसा मुझे दो साल पहले फैज़ाबाद छोड़ते वक्त हुआ था। कब भोपाल और यहां के लोग मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा बन गये पता ही नहीं चला। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं और शैलेन्द्र अपने हास्टल के सामने बैठकर ये प्लान कर रहे थे कि कैसे दो साल गुजारे जायेंगे, कितनी छुट्टियाँ होंगी और हम कितनी बार घर जायेंगे। अब हँसी आती है उस बात पर क्योंकि हमें यह नहीं पता था कि भोपाल भी हमारे घर जैसा होने वाला है, और हम एक बड़े परिवार (हमारी युनिवर्सिटी) का हिस्सा होने वाले हैं।........................
हम बहुत भाग्यशाली रहे कि हमें संजय सर और मोनिका मैम जैसे टीचर मिले। इनके होते हुए हमें भोपाल जैसे नये, अनजाने शहर में कभी भी अभिभावक की जरुरत महसूस नहीं हुई। पहले दो सेमेस्टर तक मैं मोनिका मैम से बहुत डरता था क्यों, ये आज तक नहीं पता चला। शायद मोनिका मैम की हर महीने होने वाली स्पेशल क्लास थी जिसमें वो सब्जेक्ट को छोड़ कर हम सभी को मीडिया से जुड़े करिअर में समस्याओं और परेशानियों के बारे में उदाहरण दे कर समझाती थीं, उनका इरादा कभी भी हमें डराने या मीडिया लाइन छोड़ने के लिए नहीं होता था। पर उन्हे जब भी लगता था हम पढ़ाई के प्रति लपरवाह हो रहें या डिपार्टमेन्ट में कोई कांड होता था तो वो ऐसी क्लास अचानक ले लेती थीं, और क्लास के अन्त में कई भयावह उदारण सुनने के बाद हमारे उतरे हुए चेहरे को देख कर कहती थीं, “उदास क्यों हो गये हो तुम लोग, परेशान मत हो पढ़ाई पर ध्यान दो अपने लक्ष्य तय करो और उसके लिए आज से मेहनत करो”। हम अगर किसी क्लास में सबसे ज्यादा मस्त होते थे तो वो थी संजय सर की क्लास, कुछ ही विभागाध्यक्ष होंगे जिनके क्लास में इतने ठहाके लगते होंगे, लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल भी की नहीं की उनके क्लास में पढ़ाई नहीं होती थी। हर एक सामाजिक मुद्दे के गहरी समझ के साथ व्यवहारिकता का सांमजस्य उनके व्यक्तित्व का सबसे मजबूत पक्ष है। पत्रकारिता जगत की बारिकियों को हमने संजय सर से ही समझा। इन दोनों शिक्षकों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। इनके प्यार और सहयोग से आज हम सभी अपने उज्जवल भविष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं।................
हमें दुनिया के सबसे अच्छे सीनियर मिले। 7*24 घंटों में हम उन्हे कभी भी परेशान कर सकते थे। रैगिंग क्या होती है इस शब्द के अर्थों से हमारा परिचय कभी नहीं हुआ। मेरी कई रातें अपने सीनियर्स के साथ बहसों में गुजर जाती थी। किसी भी मुद्दे पर छिड़ी बात पर रात भर तर्क और दलीलें दी जाती थीं। उस वक्त कोई भी हमें देखता तो सोचता की हम लड़ रहे हैं, लेकिन मुझे एहसास है कि कभी किसी ने किसी बात को व्यक्तिगत नहीं लिया। आज भी कई ऐसे मुद्दे रह गये हैं, जिनपर हम एकमत नहीं हो पाए हैं, लेकिन फिर भी हम एक दूसरे के विचारों का सम्मान व्यक्तिगत सोच मानकर करते हैं । अंतरराष्ट्रीय दर्शन, साहित्य और फिल्मों के प्रति जिज्ञासा और रुचि अगर मेरे मन में जागी तो उसके पीछे मेरे इन्हीं सीनियर्स की हाथ था ।.............................
दोस्तों की क्या बात करूँ, भोपाल छोड़ते वक्त इनके बिछड़ने के गम ने तो रूला दिया। घर से दूर रह कर पढ़ाई करने में एक खास बात है कि कई बार आप को लगेगा कि आप 24 घंटे एक ही प्रकार की ज़िन्दगी जी रहे हैं। जो दोस्त कालेज में आपके साथ पूरा दिन बिताते हैं शाम के बाद भी वही आप के साथ मस्ती करते, खाना खाते, पढ़ते वक्त भी साथ में होते हैं। यह बहुत अजीब लेकिन अद्वितीय अनुभव होता है। मैं चाय का शौकीन कभी नहीं रहा पर अपने दोस्तों (सीनियर्स और जूनियर्स भी शामिल) के साथ रात ग्यारह बजे से लेकर चार बजे तक कभी भी हबीबगंज स्टेशन चाय पीने निकल जाता था। फस्ट डे फस्ट शो, लेट नाइट शो, प्ले, म्यूजिकल नाइट शो ये सभी अनुभव मुझे भोपाल में ही अपने दोस्तों के साथ हुए। हम कई दोस्त इन्टर्नल एक्जाम से एक दिन पहले कैफे काफी डे काफी पीने जाते थे। काफी हाउस में बैठकर इतना फोटो सेशेन होता था कि माडल भी घबरा जायें। हमारा ऐसा मानना था कि ऐसा करने से पेपर अच्छा होता है (ऐसा सिर्फ मानना था बाकी पढ़ाई तो करनी ही पड़ती थी)। हम किराया एक मकान के देते थे लेकिन रहने के ठिकाने कई होते थे। सेकेन्ड सेमेस्टर एक्जाम से पहले पन्द्रह दिन तक पहले मैं अपने रूम पर नहीं रहा (क्योंकि गौरव और मयंक के रूम ज्यादा ठंडे थे)। अनगिनत रातें हमनें बातों में गुजारी (अगले दिन सभी क्लास में ज्माहाई लेते रहते थे)। हमारे हास्टल का एक खास प्रचलन था कि अगर कोई बीमार पड़ता था, और कई दिनों तक तबियत न ठीक हो रही हो तो उसे कम से कम 15-16 लड़के लेकर रात 2 बजे जबरदस्ती उठाकर सिटी हास्पिटल ले जाया जाते थे (रात में इतनी भीड़ देखकर हास्पिटल वाले घबरा जाते थे), और एक दो इन्जेक्शन लगवा दिए जाते थे, और इसके बाद हर कोई चंगा हो जाया करता था।................
इन सारी कहानी के एक बहुत अहम हिस्सा हमारे जूनियर्स भी हैं। सभी मस्त और बिंदास (जिनको मैं जानता और पहचानता था)। उनके यूनिवर्सिटी में कदम रखते ही, आंदोलनात्मक माहौल में हमने उनका स्वागत किया। प्रतिभा (वार्षिक खेल और सांस्कृतिक आधारित कार्यक्रम) में सबने अपनी प्रतिभा दिखाई (भले ही किसी प्रतियोगिता में भाग लिया हो या ना लिया हो)। मेरा विश्वास ही नहीं बल्कि यह दावा है कि वे सभी अपने करिअर में बहुत आगे जायेंगे। कुछ जूनियर्स के आने के बाद मुझे यह फायदा हुआ कि हर बृहस्पतिवार लड्डू खाने के लिए मिलने लगे( वो व्रत क्यों रहते थे ये बिना जाने)। व्रत से उनको कितना फायदा हुआ ये मुझे नहीं पता पर हाँ मुझे लड्डुओं का फायदा जरूर मिला( भगवान ऐसे जूनियर सभी को दें।....................फिर मिलेंगें
(लेकिन ये सब अब पीछे छूट गया है, अब वैसे दिन फिर कभी नहीं आने वाले। हम सभी अपने- अपने करिअर का चुनाव करके, एक दूसरी जिन्दगी जीने के लिए अलग- अलग रास्तों पर चल पड़े हैं। हमने आज तक जो भी शिक्षा ग्रहण की है उसको ज़िन्दगी की कसौटी पर तौलने का वक्त आ गया है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मेरे सभी दोस्त अपने अपने क्षेत्र में बेहतर से बेहतर काम करके अपनी एक अलग पहचान बनाएं।)

--------देवाशीष मिश्रा,

Wednesday, September 15, 2010

अयोध्या, 1992

कहते हैं जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि
कुँवर नारायण की यह कविता इसी का चरितार्थ करती है
अयोध्या मुद्दे पर उनके इस विचार को पढ़ें तथा मस्तिष्क को खुले विचारों से जोड़ें

हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस-बीस नहीं
अब लाखों सिर-लाखों हाथ हैं
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है।
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमटकर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है
‘मानस’ तुम्हारा ’चरित्र’ नहीं
चुनाव का डंका है!
हे राम, कहाँ यह समय
कहाँ तुम्हारा त्रेता युग
कहाँ तुम मर्यादा पुरूषोत्तम
और कहाँ यह नेता युग!
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुराण-किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक...
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!
-कुवँर नारायण

Saturday, September 4, 2010

धुँधली चमक से रोशन गली

यह सच है कि दुनिया में सबसे बड़ा रिश्ता माँ का होता है, लेकिन उस एहसास को क्या कहेंगे, जब एक माँ अपने नवजात शिशु को पहली बार देखती है, वह प्रेम, वह खुशी, वह सम्पूर्णता का एहसास। क्या नाम दें उस एहसास को? विश्व कोश खाली सा दिखाई पड़ता है, लेखक, साहित्यकार, कवि सभी लाचार दिखते हैं इस एहसास के सामने। फिलहाल इस एहसास को जोड़ने वाली कड़ी का पारम्परिक नाम है हमारे सामने और वह नाम है दायी। दायी! अब शायद ही यह नाम पहले की अपेक्षा ज्यादा प्रयोग के प्रचलन में हो अथवा आधुनिक चिकित्सा पद्धति में यह नाम खोता जा रहो परन्तु भारतीय हिन्दी शब्दकोश में यह नाम आज भी सम्मानीय है।
इस दायी के महत्व को यदि किसी ने समझा है तो वह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के इब्राहिमपुरा इलाके की एक गली, जिसका नाम भोपाल की बेगम ने ‘गुलिया दायी की गली’ रखा था। 100 मीटर लम्बी यह गली आजाद मार्केट से शुरु होती है तथा इसका दूसरा सिरा चिंतामन चौराहे पर खत्म होता है। विभिन्न प्रकार के दुकानों से सजी यह गली आज भी अपने महान इतिहास को समेटे हुए है, जहाँ आज भी गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल देखी जा सकती है। यह वही गली है, जो भोपाल के नवाबी दौर के समय दशहरे को मनाने की परम्परा शुरू हुयी थी।
इसी गली में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने वैद्य खुशीलाल शर्मा के घर जन्म लिया था। विधान सभा सदस्य बाबू लाल भारती व उनके छोटे भाई मशहूर गजल गायक चमनलाल भारती, उस्ताद अजीमुल्ला खाँ, प्रसिद्ध कम्युनिस्ट लीडर मोहनी देवी, पत्रकार प्रेम बाबू, पहली विधान सभा के सदस्य सरदार मल्लवानी के घर भी इसी गली में हैं। इतनी महान हस्तियों के होने के बावजूद यदि लोग इस गली को किसी नाम से जानते हैं तो वह है ‘गुलिया दायी’।
स्त्री के इस रूप का सम्मान शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में दिखे। गुलिया दायी! यह वह नाम है जो न जाने कितने शिशुओं को नई जिन्दगी दे गयीं। जिनके बारें में कहा जाता है कि वह बीमार बच्चों को छूकर ही उनकी बिमारी जान जाती थीं। जाति-धर्म का भेदभाव किए बिना वे लगातार सेवाभाव से अपना काम करती थीं। दिन हो या रात, मौसम का मिजाज अच्छा हो या खराब वे हमेशा दूसरों की सेवा के लिए तैयार रहती थीं। भोपाल की बेगम की मुख्य दायी होने के बावजूद उनका जीवन साधारण व सरल था। उनकी नजर में न कोई अमीर था न कोई गरीब, अगर था तो केवल इंसान और जिसकी सेवा करना वे अपना कर्तव्य समझती थीं।
मदर टरेसा को हम सभी जानते हैं। उनकी 100 वीं जन्म तिथि पर हम आज उन्हे गर्व और प्रेम से याद कर रहे हैं। लेकिन गुलिया दायी का नाम आज लोगों को पता नही बस भोपाल की गलियों में उनकी यादें शेष रह गयीं हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भले ही दायी की भूमिका कम हो गयी हो लेकिन स्त्री शक्ति और प्रेम का यह रूप हमेशा गुलिया दायी के रूप में दिखायी देगा।

Wednesday, September 1, 2010

गरीबों के खेत, अमीरों के पेट

पिछले कुछ समय से दो खबरों से जुड़ी बातें लगातार अखबारों और इलेक्ट्रानिक चैनलों में जोर-शोर से आ रहीं हैं। एक बढ़ती मँहगाई जिससे आम जन त्राहि-त्राहि कर रहा है। दूसरा सरकारी व्यवस्था में सड़ता अनाज। भारत में रोज ना जाने कितने पेट खाली ही सो जाते हैं, इस उम्मीद में कि शायद कल पेट भर जाये। आखिर इस व्यवस्था का दोषी कौन है? वो नेता जो स्वतत्रं भारत में सबकी खुशहाली देने का वादा करते हैं या फिर वो कानूनी, प्रशासनिक व्यवस्था जिसे हमें अग्रेजों की विरासत के रूप में ढो रहे हैं। ताज़्जुब होता है कि सरकारी कानून व्यवस्था से पीड़ित होकर हमारे वीर स्वतंत्रता सेनानियों ने अग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूँका था। आज हमारी सरकार उसी संशोधित अथवा यथावत 100 सालों या उससे अधिक सालों पूर्व बने कानून से देश को चला रही है।
26 अगस्त 10 को लगभग पचास हजार किसानों ने संसद का घेराव उस कानून के खिलाफ किया जिसके आधार पर सरकारें अनाज पैदा करने वाले किसानों की जमीन बहुत कम कीमत में खरीद लेती हैं। किसी किसान की उसकी पैतृक कृषि-भूमि से क्या संबंध होता है, यह केवल वह किसान ही समझ सकता है जिसकी ज़िन्दगी का ज्यादातर हिस्सा उस खेत पर ही गुजरता है। जून की चिलचिलाती धूप हो या दिसम्बर-जनवरी की हांड़ कँपाने वाली ठंड हम सभी इनसे बचने के कई प्रकार के प्रयास करते रहते हैं, लेकिन किसान तो उसी मौसम में दिन हो या रात अपने खेत पर पहुँच जाता है, रोजी-रोटी की आस में। वर्तमान में हमारे देश के किसान पूर्व की समस्याओं के अलावा तीन अन्य समस्याओं से जूझ रहें हैं। पहला, खेती के व्यवसाय में कई बार बेची गई अनाज की कीमत लागत से कम होती हैं। एक ओर जहाँ सरकारी मशीनरियाँ लागत मूल्य कम करने में असफल होती हैं वहीं दूसरी ओर बाज़ार में अनाज बेचने के लिए सही मूल्य निर्धारित करने में भी असफल होतीं हैं। दूसरा सबसे बड़ा कारण, उदासीन सरकारी नीतियों की वजह से किसानों को क्या पैदा करना है, इसमें असमंजस। पिछले कई वर्षों से यह बात देखने में आ रही है कि जिस साल किसी खास अनाज की कमी होती है या उसको उगाने वाले किसानों को लाभ होता है तो सभी किसान उसी खाद्य फसल को उगाने लगते हैं जिससे अगले वर्ष फसल की तो अच्छी पैदावार हो जाती है लेकिन अच्छी पैदावार होने के कारण उस फसल की कीमत गिर जाती है। जिससे किसानों को नुकसान हो जाता है। इसके साथ ही दूसरी तरफ अन्य फसलों की पैदावार में कमी आ जाती है। इसमें दलाल जमाखोरी कर समस्या को और बढ़ा देते हैं। कम पैदा हुई फसल की कीमत बढ़ जाती है, जो मँहगाई बढ़ने का कारण होती है। इन सब बातों का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह होता है कि ना तो ज्यादा पैदावार वाली फसल के किसानों को फायदा होता है और ना ही कम फसल पैदा करने वाले किसान को। अब तीसरी बड़ी समस्या पर आते हैं देश में तेजी से बढ़ते औद्योगिक विकास के लिए, परिवहन व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए तथा विकास सम्बन्धी अन्य कार्यों को बढ़ाने के लिए सरकारें आम किसानों की भूमि का अधिग्रहण करती जा रही हैं। उपरोक्त कारणों से भूमि का अधिग्रहण करना बिल्कुल भी गलत नही परन्तु उसकी वजह से किसानों को होने वाली समस्याओं का निपटारा बहुत ही गंभीरता व बेहतर तरीके से करना चाहिए। हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि खेती की भूमि न सिर्फ किसानों की अजिविका का साधन हैं बल्कि उससे उनकी गहरी संवेदनाऐं भी जुड़ी होती हैं। इसके साथ ही हमें उन कानूनों व नियमों को पुन: अवलोकन करना होगा, जिससे हमारे किसानों की समस्याऐं बढ़ती जा रही हैं।
कृषि विकास दर को बढ़ाने के लिए हमें खेती के व्यवसाय को एक लाभप्रद रोज़गार के रूप में विकसित करना होगा। इसके लिए बहुत जरुरी है कि हमारी सरकारों के पास खेती के व्यवसाय से जुड़ा एक स्पष्ट दृष्टिकोंण हो तथा उस लक्ष्य को पाने में आने वाली अड़चनों के लिए पहले से तैयारी हो। यह सत्य है कि हम आज भी पूरी तरह मानसून पर निर्भर है हमें मानसून पर इस निर्भरता को कम करना चाहिए। इसके लिए देश के की नदियों को जोड़ने का प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना होगा। नदियों के आपस में जुड़ जाने के बाद हम बाढ़ और कम बारिश वाले क्षेत्रों में एक संतुलन पैदा करने में काफी हद तक सक्षम हो जायेंगे। इसका सीधा फायदा हमारे किसानों को होगा।
देश की आर्थिक व्यवस्था को अगर हमें मजबूत बनाना है तो हमें इन तीनों समस्याओं को जड़ से समाप्त करना होगा।
इस आशा के साथ ही हम उस बात पर फिर आते हैं, जहाँ ये बात शुरू हुई थी। हमारे केन्द्रीय कृषि मंत्री ने गरीबों को अनाज मुफ्त में बाँटने से इंकार कर दिया है। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? कहीं सरकार की नजर उस भारी टैक्स पर तो नहीं, जिसे सरकार इन अनाज को शराब बनाने वाली कम्पनियों को बेचकर कमाना चाहती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने शराब पर 2 प्रतिशत टैक्स की और बढ़ोत्तरी की जिससे उसे 200 करोड़ रु का राजस्व प्रतिवर्ष प्राप्त होगा। इस राशि का इस्तेमाल वह नगर पालिका और नगर निगम की जर्जर होती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए करेगी।
हमें विकास से परहेज नही है, लेकिन गरीब आम व्यक्ति से निवाला छीन कर बनाई गई शराब पर करके नहीं। सरकार की यह नीति कितनी दोषपूर्ण दिखाई देती है। इन्ही नीतियों की वजह से आज शुध्द पानी मिलना मुश्किल है लेकिन शराब सहज ही हर जगह मिल जाती है। शराब की वजह से कितनी बुराईयाँ फैलती हैं यह यहाँ कहने की जरूरत नही। हम सभी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं। हालाँकि अन्तोदय योजना चल रही है तथा यूपीए सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने की तैयारी में है। लेकिन फिर गरीबों के पूर्ण हित की बात तथा खाद्य सुरक्षा मिलना अभी दूर का विषय लग रहा है। मुझे तो उस दिन का इन्तजार है जब सभी भारतीयों के लिए पर्याप्त पौष्टिक भोजन होगा और सभी किसानों का हित सुरक्षित होगा।