Saturday, September 4, 2010

धुँधली चमक से रोशन गली

यह सच है कि दुनिया में सबसे बड़ा रिश्ता माँ का होता है, लेकिन उस एहसास को क्या कहेंगे, जब एक माँ अपने नवजात शिशु को पहली बार देखती है, वह प्रेम, वह खुशी, वह सम्पूर्णता का एहसास। क्या नाम दें उस एहसास को? विश्व कोश खाली सा दिखाई पड़ता है, लेखक, साहित्यकार, कवि सभी लाचार दिखते हैं इस एहसास के सामने। फिलहाल इस एहसास को जोड़ने वाली कड़ी का पारम्परिक नाम है हमारे सामने और वह नाम है दायी। दायी! अब शायद ही यह नाम पहले की अपेक्षा ज्यादा प्रयोग के प्रचलन में हो अथवा आधुनिक चिकित्सा पद्धति में यह नाम खोता जा रहो परन्तु भारतीय हिन्दी शब्दकोश में यह नाम आज भी सम्मानीय है।
इस दायी के महत्व को यदि किसी ने समझा है तो वह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के इब्राहिमपुरा इलाके की एक गली, जिसका नाम भोपाल की बेगम ने ‘गुलिया दायी की गली’ रखा था। 100 मीटर लम्बी यह गली आजाद मार्केट से शुरु होती है तथा इसका दूसरा सिरा चिंतामन चौराहे पर खत्म होता है। विभिन्न प्रकार के दुकानों से सजी यह गली आज भी अपने महान इतिहास को समेटे हुए है, जहाँ आज भी गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल देखी जा सकती है। यह वही गली है, जो भोपाल के नवाबी दौर के समय दशहरे को मनाने की परम्परा शुरू हुयी थी।
इसी गली में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने वैद्य खुशीलाल शर्मा के घर जन्म लिया था। विधान सभा सदस्य बाबू लाल भारती व उनके छोटे भाई मशहूर गजल गायक चमनलाल भारती, उस्ताद अजीमुल्ला खाँ, प्रसिद्ध कम्युनिस्ट लीडर मोहनी देवी, पत्रकार प्रेम बाबू, पहली विधान सभा के सदस्य सरदार मल्लवानी के घर भी इसी गली में हैं। इतनी महान हस्तियों के होने के बावजूद यदि लोग इस गली को किसी नाम से जानते हैं तो वह है ‘गुलिया दायी’।
स्त्री के इस रूप का सम्मान शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में दिखे। गुलिया दायी! यह वह नाम है जो न जाने कितने शिशुओं को नई जिन्दगी दे गयीं। जिनके बारें में कहा जाता है कि वह बीमार बच्चों को छूकर ही उनकी बिमारी जान जाती थीं। जाति-धर्म का भेदभाव किए बिना वे लगातार सेवाभाव से अपना काम करती थीं। दिन हो या रात, मौसम का मिजाज अच्छा हो या खराब वे हमेशा दूसरों की सेवा के लिए तैयार रहती थीं। भोपाल की बेगम की मुख्य दायी होने के बावजूद उनका जीवन साधारण व सरल था। उनकी नजर में न कोई अमीर था न कोई गरीब, अगर था तो केवल इंसान और जिसकी सेवा करना वे अपना कर्तव्य समझती थीं।
मदर टरेसा को हम सभी जानते हैं। उनकी 100 वीं जन्म तिथि पर हम आज उन्हे गर्व और प्रेम से याद कर रहे हैं। लेकिन गुलिया दायी का नाम आज लोगों को पता नही बस भोपाल की गलियों में उनकी यादें शेष रह गयीं हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भले ही दायी की भूमिका कम हो गयी हो लेकिन स्त्री शक्ति और प्रेम का यह रूप हमेशा गुलिया दायी के रूप में दिखायी देगा।

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